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Tuesday, September 8, 2015

भेद

चंपकवन के बीचोंबीच एक सरिता बहती थी। उस सरिता के एक तरफ के जंगल पर गीदड़ों का राज्य था।
गीदड़ों के रोज रात को हू हू करने पर पूरे जंगल और उसके आस पास के इलाकों में उनकी ख्याति संगीतज्ञ और कला प्रेमियों के रूप में भी हो चली थी। आस पड़ोस के जंतु यह मानने भी लगे थे कि यदि कहीं स्वर्ग है तो यहीं इसी गीदड़ों के साम्राज्य में।

उसी सरिता के ऊपर की तरफ , लेकिन दूसरे तट से परे हट कर शेर राज करते थे। कई बार वहां से हलकी दहाड़ की ध्वनि आती , लेकिन उससे जंतु थोड़े भयभीत और थोड़े अनमने ही रहते।
एक दिन एक शेरनी ने एक शावक को जन्म दिया। बच्चा जब कुछ दिनों में चलने योग्य हो गया तो पानी पीने सरिता के पास पहुंचा। लेकिन पानी पीते हुए उसके पैर फिसल गए और वो सरिता में गिर पड़ा। वह छटपटाया कि तट पर आ सके , लेकिन बहता हुआ दूसरी तरफ , सरिता के नीचे चला गया।
वहाँ उस पर एक गीदड़ की दृष्टि पड़ी और वो उसे दांत में दबा कर धीरे से उठा कर राज्य में लेता आया। बच्चे शेर ने देखा , दरबार में हू हू का गायन पूरे उल्लास से चल रहा था।
बच्चे ने पूछा- "चाचा जी, ये क्या हो रहा है?"
गीदड़ बोला -"यहाँ हम लोगों के हाथों आज एक मरा हुआ हाथी लगा है , उसी का जलसा है। "
गीदड़ आगे बोला - "तुम्हें यहाँ हम शिकार करना सिखाएंगे। तुम्हें करना ये है कि जैसे कोई जानवर देखो, उसके पीछे लग जाओ। अगर वो धीरे चलता हुआ लगा, तो शायद बीमार भी होगा।  अगर उसकी मृत्यु हो गयी, तो हमारी तरह गाने लगना। फिर हम सब जमा हो जायेंगे और उसको घसीट के यहाँ लेते आएंगे। "
"और अगर जानवर नहीं मरा तो ?" - बच्चा उत्सुक हो गया।
"तो फिर कोई दूसरा जानवर मारेंगे , लेकिन याद रखो, हर दिन एक जानवर का शिकार ज़रूरी है। "
"लेकिन ज़रूरी तो नहीं की हर रोज़ एक जानवर मरे ही। "
"लेकिन अगर रोज़ जानवर नहीं लाओगे तो गीदड़ राजा से डांट भी पड़ेगी और उनकी सभा में अपमानित भी होना पड़ेगा। एक बार उन्होंने ऐसे ही एक गीदड़ को शिकार में बार बार खाली लौटने पर राज्य से निष्कासित कर दिया था। ओह बेचारा कहाँ जाता इतनी समृद्ध जगह छोड़ कर।  आज भी बेचारे के लिए दया ही आती है। "

सोच कर बच्चे के माथे पर बल पड़ गए।  अच्छी मुश्किल थी, शिकार मरेगा ही, इसका क्या भरोसा।
अगले दिन से छोटे शेर ने अपना दिमाग चलना शुरू किया। एक हफ्ते के आराम के बाद उसे भी शिकार पर ले जाया गया। उसे उस दिन एक बकरी का छौना मर हुआ मिला।
उसने अपनी ओर से गाने का प्रयास किया, किन्तु उतना माधुर्य न ला सका जितना बाकी गीदड़ लाते थे।

खैर, गीदड़ सुन के आये, और शिकार उठा कर ले चले। बच्चा अपने पहले शिकार के लिए बधाई चाह रहा था।  झटके से उसकी सोच टूटी , देखा, गीदड़ों का राजा उसे डांट रहा था - "इतना छोटा शिकार? इससे क्या होगा? और तुम्हें गाना नहीं आता? अगली बार ध्यान रहे!"

बच्चे का डर सच जैसा हो रहा था।  यहाँ पर जल्दी ही कुछ और करना होगा , वरना दाल नहीं गलेगी।
उसे उस दिन एक जोड़ा खरगोश मरे हुए मिल गए, और उसने अपने साथी से कहा, गा के बताओ, मैं सीखूंगा।  उसके साथी ने गाया, और बाकी गीदड़ आये, और खरगोश उठा के ले गए। उस दिन के अंत में गीदड़ राजा ने साथी गीदड़ की पीठ थपथपाई - "तुम्हारे गाने का अंदाज़ निराला था , निस्संदेह, इस जानवर की खोज का सारा श्रेय तुम्हें ही जाता है ! हम सभी को तुमसे आशाएं हैं !"
शेर का बच्चा भौंचक सा रह गया। गाना इतना महत्त्वपूर्ण है, शिकार खोजने से भी ज्यादा, ये उसको पता ही नहीं था!उसने सोच लिया कि वो भी गायेगा और शिकार का श्रेय लेगा।
शिकार का स्वाद उसे अच्छा नहीं लग रहा था।  ठन्डे मांस में सुख नहीं मिल रहा था , लेकिन जब सारे ही उत्कंठित हैं, तो ज़रूर यही सही होगा।
शेर अब अकेला जाने लगा और उसने अलग अलग तरीके भी ईजाद करने शुरू कर दिए, मसलन, कभी घात लगा कर अपने पंजों और दांतों से जानवर घायल कर देना, और छोटे जानवर जैसे बकरी, सूअर के बच्चे, इत्यादि को मार कर ले आना।  सब सही, लेकिन दो दिक्कतें थीं,गीदड़ राजा से बार बार निराशा मिलती थी,एक तो जानवर छोटे थे, कभी मिले तो कभी नहीं मिले, और दूसरे कि गण बड़ा ही बेसुरा था।
गाने की कमज़ोरी के कारण शेर के साथ एक गीदड़ मित्र भी रख दिया गया। गीदड़ जाएगा, जब शेर शिकार करेगा।
शेर ने फिर एक शिकार किया , गीदड़ गाया और टोही दल आ कर शिकार ले गया। राजा गीदड़ ने मित्र गीदड़ की भूरी भूरी प्रशंसा की कि किस भाँती उसने अपनी कला से शिकार को अंजाम दिया।
शावक गीदड़ को फिर से डांट पड़ी क्योंकि एक सूअर बहुत बड़ा नहीं था, अतएव बहुत लोगों का पेट नहीं भरेगा।

कुछ महीने बीत चुके थे, और छोटा शावक थोड़ा बड़ा हो गया था। वह बड़ा ही उदास रहने लगा था।  उसे हमेशा डर रहता था कि आज शिकार कैसे मिलेगा। अगर मिला तो बड़ा जानवर कैसे मारें, और उसको शाबाशी कब मिलेगी , अपनी मेहनत का पुरस्कार कब मिलेगा। अभी कुछ दिनों पहले की बात थी, उसने एक भैंसे को एक ही वार में चित्त कर दिया था।  लेकिन गीदड़ राजा की शायद समझ नहीं आया की एक पंजे में चित्त कर देने में कौन सी बहादुरी है , अतः उन्होंने बिना जाने बड़ाई नहीं की।  कला प्रेमी होने के कारण उनके कान संगीत को भली प्रकार समझते थे और इसलिए बाकियों की तारीफें भी करते थे, भले ही उन्हें शिकार रोज़ मिले या नहीं। क्योंकि उन्हें गाने का लहज़ा पता था। शावक को इस बात का बेहद मलाल था कि  चाह के भी उसे गाना नहीं आ पा रहा था।
दूसरों की लार लगी हुयी जूठन खाने में सुख नहीं था, और अपमानित होने में तो बिलकुल भी नहीं। अगर रोज़ भोजन लाने पर ये हालत है, तो किसी दिन शिकार ना मिला तो क्या होगा, इसकी चिंता उसे खाए जा रही थी। जंगल छोड़ कर जाएँ भी तो कहाँ? यह जंगल काफी समृद्ध था, और आस पड़ोस के जीव भी वहां के निवासियों को बड़ी आदर मिश्रित भय की दृष्टि से देखते थे। वैसा सम्मान उसे किसी और जंगल में भला मिल सकता था ?
इसी उधेड़बुन में एक दिन वह चलता हुआ सरिता के ऊपरी हिस्से पर चला गया। उस दिन वहां एक बाघ पानी पीने आया हुआ था।
उसने देखा, एक शेर दूसरी तरफ खोया खोया चल रहा है तो उसने आवाज़ दी। छोटे शेर ने देखा, बाघ बोल रहा था।  उसे बड़ा अचरज हुआ कि उसकी बोली बहुत बेसुरी नहीं है, और भी जंतु हैं जो बराबर ही हैं !
बाघ ने उससे पूछा - "तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"
शेर बोला "बहता हुआ चला आया था। "
बाघ बोला -"अरे! तुम हमारे जंगल के हो, वहां गीदड़ों के बीच क्या कर रहे हो! इधर आओ!!"
"लेकिन वहां बड़ी समृद्धि है!"
"कैसी समृद्धि? तुम शेर हो, और यहीं शोभा देते हो। मरे हुए जानवर खा के रिरियाने में कौन सा सम्मान है? क्योंकि शेर उस तरफ आते नहीं, इसीलिए बाकी के जाहिल जानवरों को ये गीदड़ ही महान लगते हैं!"
"क्या, सच?"
"तो और क्या!"
"मैं वहाँ आ जाऊं?"
"तुम्हारी उचित जगह यही है "
शावक भी उस जीवन से उदास हो चुका  था , और वो उस दूसरे जंगल को देखने को भी उत्सुक था जहाँ बाकी सब भी उसी के जैसे थे। किंतु सरिता में तैरना अभी भी बालक को नहीं आता था। उसने तुरंत एक युक्ति सोची।वह थोड़ा और ऊपर चला गया और सरिता में कूद गया. इस बार, उसने हाथ पाँव चलाये और वेग के साथ बहता हुआ थोड़ा आगे जा कर दूसरे  तट  पर आ लगा।  इस भाँती नन्हे शेर ने सरिता वापस पार की और अपनी तरह के जंतुओं के बीच रहने लगा।
उसको यह सब जान कर ख़ुशी हुयी कि बाज़ जानवर यहाँ अपना शिकार खुद करते हैं, और रिरियाने के बजाये दहाड़ते हैं। उस जंगल में उसके अपने ईजाद किये हुए घात लगाने की विधि को सराहा गया।
उस शेर ने उस जंगल में अपने दिन बड़ी उमंग और इत्मीनान से गुज़ारे।

शिक्षा: १. गीदड़ों से गर्जन को सराहने की अपेक्षा मत करो।
२. अगर कड़ी मेहनत से भी परिणाम न आये तो नयी दिशा से मेहनत करो

Tuesday, December 4, 2012

सहज मित्रता

एक गधा एक दिन अपने मालिक से तंग हो कर जंगल में भाग आया। जंगल में हरी और मजेदार घास का स्वाद अच्छा लगा तो वहीँ लोटने भी लगा।
इतने में एक गिलहरी उसके बगल से गुजरी। ऐसा जानवर उसने कभी नहीं देखा था। सोचा, मुलाकात की जाये। पेड़ पर चढ़ कर थोड़ी दूरी बनाते हुए उसने लोटते गधे को आवाज़ दी। गधे के चारों पैर ऊपर। बीच से गर्दन निकाल कर देखने लगा। गिलहरी पूछ रही थी- तुम्हारा नाम क्या है?

गधे ने बताया- गधा। गिलहरी ने देखा, गधे के खुर हैं, इसलिए वह पेड़ पर नहीं चढ़ सकता।
थोड़ी नीचे आ कर गिलहरी ने गधे की कहानी सुनी, और उसे पता चला की नए होने के कारण गधे का कोई मित्र नहीं था। गधे को प्यास लगी थी, तो गिलहरी ने नाले का पता बताया। गधा खुश हो गया -
"मैं प्यास बुझा कर फिर आता हूँ, फिर आगे बात होगी।"
"लेकिन संभल कर जाना, वहां आम के पेड़ पर एक लड़ाकू बन्दर रहता है।"
"झगड़ालू  बन्दर?"
"हाँ, उसकी सभी जंतुओं से लड़ाई होती रहती है। अभी सूअर की पूंछ नोच ली, जब वह वहां पानी पीने गया, जबकि सूअर उसका दोस्त था।"

गधा सतर्क हो कर नाले से पानी पीने चला। इसके पहले तो मालिक ही पानी देता था, यहाँ इस खतरनाक बन्दर से बचते हुए पानी पीना पड़ेगा, ऐसा तो सोचा नहीं था।

चलते हुए नाला आ गया, और गधे ने जी भर कर पानी पिया, और वापस आ ही रहा था की उसको एक गौरैया मिली। गौरैया ने पहचान करने के पश्चात् पूछा- कहाँ से आ रहे थे?
गधे ने बताया - "अभी नाले से प्यास बुझा के और लड़ाकू बन्दर को दोस्त बना कर लौट रहा हूँ।"
गौरैया ने कहा - "उसकी किसी से नहीं बनती।"
"गिलहरी भी ऐसा वृत्तान्त बता रही थी।" फिर गधा गौरैया को गिलहरी से हुयी बात बताता चला गया।
"आम वाले बन्दर की आदत है, शुरू में दोस्ती करता है, फिर लड़ना शुरू कर देता है। उसने सब के साथ ऐसा ही किया है।"
"ये मैं उससे मिलते ही समझ गया था।", गधे ने कहा, "जितनी आतुरता से उसने मेरा इस वन में स्वागत किया, बातों ही बातों में ये पता चला की वो भी मित्रहीन है, समझ में आ गया कि इसका स्वाभाव ही इसका शत्रु है।"

"कैसे?"

"उसने खुद ही बताया कि  सूअर उसका मित्र होता था। लेकिन वह गन्दा रहता था। उसने सूअर को कई बार कहा था कि सफाई रखे, लेकिन सूअर उसके पेड़ से अपनी पीठ रगड़ के उसका पेड़, और नाले का तट मैला करता रहता था। एक दिन उसने उसे नोच खसोट कर भगा दिया।"

गौरैया  बोली - "वो सही कह रहा है, ऐसा ही हुआ था। सूअर ने भी ऐसा ही कहा था। उस बेचारे की समझ ही नहीं आया कि उसने ऐसा क्या कर दिया।"

"मेरी समझ में यही बात आई", गधे ने जवाब दिया, "कि बन्दर मित्रता जल्दबाजी में करता है। और जब उसके मित्र स्वतंत्रता का उपभोग करते हैं, अथवा अपने असली व्यक्तित्व को दर्शाते हैं, तो वो चिढ़  जाता है।"

"और इस बात की क्या विश्वसनीयता है कि तुम उसके शत्रु नहीं बनोगे?"

"ये, की मैं अपनी पीठ किसी और के पेड़ पे नहीं रगड़ता, और न ही मैं अचानक हुयी गहरी लगने वाली दोस्ती में स्वतंत्रता का उपभोग करता हूँ।" कह कर गधे ने गौरैया से विदा ली।



शिक्षा: तुरंत गहरी मित्रता करना शत्रुता को न्योता देना है।

Wednesday, July 21, 2010

गूंगा कुत्ता

जब मैं अपने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बम्बई वाले दोस्त के घर पहुंचा, तो देखा, उसका कुत्ता नहीं दिख पड़ रहा है। मैंने उससे पूछा- दोस्त अपना टॉमी नहीं दिख रहा?
उसने मुस्कुराते हुए कहा- मित्र, मैंने उसे अपने गोरखपुर वाले चाचा को वापस दे दिया...
उत्कंठा से ग्रसित हो मैंने भी वजह पूछ ली। फिर उसने कहानी बताई-

उसने कहा- तुम्हें तो पता ही होगा कि मेरे चाचा जी ने वो कुत्ता हमें तोहफे में दिया था। लेकिन वो बेचारा अनबोलता था।
मैंने भी झूठा अफ़सोस ज़ाहिर किया- बेचारा!
उसने अफ़सोस को स्वीकार कर के आगे कहा- वो अपनी दुम भी कम ही हिलाता था। हमें लगता था शायद जर्मन शेफर्ड ऐसे ही होते हों, तो हमने भी उसे अपना रखा था।
ऐसी ही एक रात, हमें यह लगा कि कोई कुत्ता अपने घर में चीख रहा है। शायद कोई चोर- चमार घुसा आया हो, ऐसा विचार कर के हम लोग लट्ठ और बत्ती ले कर बाहर निकले। देखा, टॉमी किसी जंगली कुत्ते की गर्दन में अपने दांत गड़ाए है, और कुत्ता बिलख रहा है। जैसे तैसे कुत्ते को छुड़वा के भगाया।
टॉर्च की रोशनी में अभी भी टॉमी की हरी आँखें अंगारों जैसी चमक रही थीं। हमें तब यह विचार चमका कि कहीं यह भेड़िया तो नहीं!
आगे मेरे दोस्त ने कहा- अपने चाचा से पूछने पर उन्होंने - शिकार के दौरान यह मिला था जंगल में। हम तो वहीँ से पकड़ के लाये थे। बस, हमने उसे तुरंत ही वापस उन्हें सुपुर्द कर दिया।
मेरा दोस्त बोला- "वही मैं कहूँ कि वो गाजर क्यों नहीं खाता था। उसके लिए ख़ास तौर पर मांस पकाना पड़ता था, जबकि हम सभी शाकाहारी हैं।"

शिक्षा: ठगे जाना भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है

Saturday, September 5, 2009

स्वर्ग की परिभाषा

किसी वन में एक ऋषि अपने परिजनों के संग रहते थे| उनके परिवार में तीन सदस्य थे, उनकी भार्या, उनका पुत्र, और उनकी पुत्री| नित्य प्रति, उनका परिवार भिक्षा हेतु पास के नगर को जाता, और जो भी भिक्षा मिलती, दिन के अंत में उसका अर्द्ध- भाग भोजन हेतु पका लिया जाता, और बचा हुआ भाग रख लिया जाता था| प्रत्येक मास, उस बचे हुए अन्न से ऋषिवर होम करते थे| उस होम की गरिमा की ख्याति स्वर्ग तक फैली थी, जहाँ से अन्य देवता भी उस यज्ञ का प्रसाद लेने आते थे|
एक दिन, जब उन ऋषि का परिवार यज्ञ का प्रसाद बाँट कर भोजन ग्रहण करने जा रहा था तो बहार से एक आवाज़ आई, "क्या सब प्रसाद समाप्त हो गया, या ब्राह्मण को कुछ मिलेगा?"
ऋषिवर ने देखा, बाहर दुर्वासा खड़े थे| संभवतया, यज्ञ की महिमा उन्होंने भी सुनी होगी|
ऋषि बोले, "पधारिये भगवन, प्रसाद अवश्य मिलेगा|"
दुर्वासा भोजन पर बैठ गए, तो ऋषि ने अपना भोजन उनके आगे कर दिया| दुर्वासा ने भोग लगाया, और बोले, "और मिलेगा?"
ऋषि को संकोच होता जान उनकी पत्नी ने उन्हें अन्दर बुलाया, और कहा, "आप उन्हें मेरा भोजन भी दे दें| वो हमारे अतिथि हैं|"
दुर्वासा के सामने और भोजन परोसा गया, किंतु दुर्वासा की क्षुधा शांत हुई| इसी भांति समूचे भोजन का भोग लगाने के पश्चात् दुर्वासा शांत हुए और गए| उस दिन उन ऋषि का परिवार भूखा सोया|
अगले महीने पुनः यही घटनाक्रम घटा, और कई महीनों तक घटता रहा, किंतु दुर्वासा के आतिथ्य सत्कार में कोई कमी हुई|
इस पूरे परिवार के कर्म को इस तरह उन्नत देख कर इन्द्र ने यह निर्णय लिया की इन्हें सशरीर स्वर्ग दे दिया जाए| ऐसा करने हेतु उन्होंने दो देवदूत इन ऋषि के पास भेजे|
देवदूतों ने ऋषि को इन्द्र की मंशा की सूचना दी, और पूछा, "क्या आप सरे आदरणीय हमारे संग चलने के इच्छुक होंगे?"
ऋषि थोडी देर सोचते रहे| कहा, "हे देवदूत, मेरे एक संशय का निवारण करें| मेरा प्रश्न ये है की स्वर्ग की परिभाषा क्या है?"
देवदूतों को अचम्भा हुआ| मुस्कान फूट पड़ी| बोले, "ऋषिवर, स्वर्ग तो सभी को पता है| यदि आप अपना प्रश्न थोड़ा और स्पष्ट करें तो शायद हम समाधान कर सकें|"
ऋषि ने पूछा, "स्वर्ग में फल कैसे मिलता है?"
"स्वर्ग में कर्म करने की आवश्यकता नहीं होती प्रभु| जीव अपने कर्म मर्त्यलोक में करता है, और उन संचित कर्मों का उपभोग करने स्वर्ग जाता है| स्वर्ग सर्वगुण संपन्न है| वहां विपन्नता नहीं है| और सारी सुविधाएं वहां उपलब्ध हैं|"
ऋषि ने अगला सवाल पूछा, "अर्थात्, स्वर्ग में यदि कर्म नहीं किया जा सकता तो वहां कर्म का क्षय होगा? कर्म- क्षय के उपरांत जीव कहाँ जाता है?"
देवपुरुष बोले, "जीव के कर्म जब घटने के पश्चात् शून्य हो जाते हैं, तो वह पुनः धरती पर जन्म लेता है, पुनः कर्म करता है, और संचित कर्मों का उपभोग करने वह स्वर्ग को प्रस्थान करता है| इसे ही जीवन मरण का चक्र कहते हैं|"
ऋषि की जिज्ञासा और बढ़ी, "और यदि कर्मों का फल किसी अधिकतम सीमा को पार कर जाए तो क्या होगा?"
"हे ज्ञानी ऋषि, स्वर्ग के सात स्तर हैं| हर स्वर्ग के अधिष्ठाता एक देवता हैं| जिस स्वर्ग की हम विवेचना कर रहे हैं, वह निम्नतम कोटि का है| उसके राजा का पद 'इन्द्र' कहलाता है| इस स्वर्ग के ऊपर और छः स्वर्ग हैं, जिनमें उच्चतम कोटि का स्वर्ग वैकुण्ठ है| जो उस स्वर्ग में जाता है, उसके कर्म अक्षय हो जाते हैं, और वह जीवन- मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है|"
कुछ क्षणों की शान्ति को भंग करते हुए ऋषि बोले, "हे देव, मैं आपके राजा इन्द्र के प्रस्ताव का आदर करता हूँ, किंतु मैं अपने कर्मों का क्षय नहीं करना चाहूँगा, अतएव, मुझे आपका निमंत्रण स्वीकार्य नहीं होगा|"
इतना कह कर ऋषि ने उन देवदूतों से विदा ली, और अपनी राह चले गए| आगे चल कर उनके कर्मों के प्रताप से उनको वैकुण्ठ मिला|

Monday, August 31, 2009

शोध


किसी जंगल में, एक वृक्ष की छाँव में बैठा एक खरहा अपने संगणक पर कोई रचना कर रहा था| तभी वहां से एक लोमड़ी गुजरी| लोमड़ी ने खरहे से पूछा, "मित्र, तुम क्या कर रहे हो?" "पी एच डी की थीसिस लिख रहा हूँ", खरहा बोला, "मेरे शोध का विषय यह है की खरहा लोमड़ी का शिकार कैसे करे?" लोमड़ी को बड़ा अचम्भा हुआ| बोली, "ऐसा होते तो मैंने कभी सुना नहीं!" "देखने की इच्छुक हों अगर आप, तो मेरे साथ मेरी गुफा में जायें|" खरहे के निवेदन और अपनी उत्कंठा को शांत करने के लिए लोमड़ी उसके पीछे चल पड़ी| कुछ क्षणोपरांत खरहा लोमड़ी की हड्डी अपने दांतों में दबा कर, कूदता हुआ वापस गया, और वापस संगणक पर अपने प्रयोग का विस्तार लिखने लगा|
इतने में वहां एक भेड़िया आया| भेड़िये ने पूछा, "कुछ कर रहे हो दोस्त?" खरहे ने उत्तर दिया "हाँ! मैं एक शोध कर रहा हूँ| शोध है कि खरहा भेड़िये का शिकार कैसे करे|" भेड़िये को अपने कानों पर विश्वास हुआ| उसने कहा, "दोस्त, ऐसा होना असंभव है|" और फ़िर लोमड़ी की भांति भेड़िया भी अपना उत्सुकता शांत करने हेतु खरहे के पीछे उसकी गुफा को रवाना हो गया, और जल्द ही खरहा पूर्व की भांति भेड़िये की हड्डी कुतरता हुआ बाहर अपने स्थान पर डटा|
ठीक उसी समय, एक जंगली सूअर वहां पहुँचा| उसको खरहे को देख कर खाने का मन हो आया| उसने ललचाई आंखों से खरहे की ओर देखा, और लगभग अपनी लार रोकता हुआ पूछा- "बड़े ज़ोर शोर से काम हो रहा है?" खरहे ने उसकी आंखों में अपने लिए भूख देखी| उसने शांत हो कर कहा "हाँ, मैं शोध कर रहा हूँ की खरहा जंगली सूअर का माँस कैसे पाये|" शूकर ऐसा सुन कर ताव में गया, आँखें गुरेरते हुए बोला, "अगर तूने मेरा शिकार ना किया ना, तो मैं आज तेरा नर्म माँस खा के मानूंगा| अब तू मेरा शिकार कर के दिखा|" "तुम भागोगे तो नहीं ना?" खरगोश ने मासूमियत से पूछा| एक कदम और आगे कर सूअर बोला, "नहीं, लेकिन मैं देखना चाहूँगा की तुम किस तरह मेरा शिकार करोगे|"
खरगोश ने टेर लगायी, "गुरूजी, कृपया बाहर आकर मुझे बताएँगे की सूअर का शिकार कैसे करते हैं?" खरहे की पुकार पर शेर गुहा से बाहर निकला| उसे देख कर सूअर के प्राण सूख गए| वह वहीं जड़ हो गया| शेर ने उसपे झपट्टा मारा और एक ही पंजे में उसे ढेर कर दिया| खरहे की ओर मुड़कर वह बोला, "सूअर का शिकार ऐसे करते हैं|"

शिक्षा
: किसी भी तंत्र में गुरु का प्रवीण होना अत्यावश्यक है|